​मुझे प्यार नहीं होता

अब मुझे प्यार नहीं होता, बातें होती हैं, मुलाक़ातें होती हैं, नहीं होता तो बस प्यार। . तुमने मुझसे प्यार किया यह तो तुम्हारा बड़प्पन है तुमने दिल का इक कोना दिया यह तो तुम्हारा अपनापन है . पर माफ़ करना  मेरे दिल में अब प्यार के अंकुर नहीं फूटते सावन के मेघ नहीं बरसते …

अब मर जाना चाहिये…

दूसरों के सपनों से, आस लिये अपनों से, जाने-अनजाने लोगों के दिल से, अब मर जाना चाहिये। सोती हुई आँखों से, बहते हुए आंसुओं से सिमटती हुई तनहा मुस्कान से, अब मर जाना चाहिये। किताब में दबे गुलाब से, गुलाब जिसको देना है उसके ख्वाब से, मुरझाई पंखुड़ियों की खुशबू से, अब मर जाना चाहिये। …

प्रीत की कलम से

इक ठहरे से लम्हे में, इक पहचानी सी आवाज़, कहा वक्त ने, मैं आया हूँ यहाँ, मिटाने ये इल्ज़ाम, मैं ठहरता नहीं, आज सुन लो ज़रा मेरी भी दास्ताँ! जिस दिन पीहर से तेरी बिदाई थी, माँ के आँसू रूके न थे, बाबुल ने भीगी नज़र छुपाई थी, उस दिन, मैं ठहरा था वहाँ... जिस …

दिल अगर टूट रहा है, टूटने दो

दिल अगर टूट रहा है! टूटने दो साथ अगर छूट राह है! छूटने दो देखो, समझो इन सारी बातों को मौसम का बदलना, इनके इशारों को बारिश तो देखे हो, पतझड़ भी देखो अब हर पेड़ रूठ जाएँ तो रूठने दो इस समय को देखो, बड़ा खिलाड़ी है जिसका साथ ना दिया, बस बेकारी है …

ऐसा वो परिंदा

जाने किस उम्मीद के, सहारे से वो ज़िंदा है, हैं कटे कुछ पर मगर, नभ देखता परिंदा है, जो हैं उसके साथी सब, कैद सारे पिंजरे में, चेहरों पर मुस्कान है, पर मन से वो शर्मिंदा है, जो जिए हैं शान से, आज़ाद से बहारों में, जी गए हर पल अमर, वो समर चुनिंदा है, …

सपना मर गया

आये थे जो कल सपने उदास थे कुछ नाराज, कुछ मायूस ऐसे जैसे कोई सपना मर गया हो मेरे कई सपनों में से एक सपना जो शायद मेरे अंदर घर कर गया था कई घरों में पलने-बढ़ने के बाद जो आये थे कल सपने उदास थे उन्होंने अपना एक सपना खो दिया।   ●सूरज सिंह …

बेसन की सोंधी रोटी पर ( निदा फ़ाज़ली )

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ याद आती है चौका-बासन चिमटा फुकनी जैसी माँ बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे आधी सोई आधी जागी थकी दोपहरी जैसी माँ चिड़ियों के चहकार में गूंजे राधा-मोहन अली-अली मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती घर की कुंडी जैसी माँ बिवी, बेटी, …

एक दिन जब माँ घर में नहीं थी

एक दिन जब माँ घर में नहीं थी घर में वो रौनक नहीं थी दीवारें मनमोहक नहीं थी घर जालों से खंडहर में बंध गया था बगीचे के फूलों में वो खुश्बू नहीं थी आखिर उन्हें पानी देने वाली जो नहीं थी एक दिन जब माँ घर में नहीं थी दहलीज़ पे वो चमक नहीं …

एक ढाँचे का टूटना

विश्वास जब टूटता है, उम्मीदों का ढाँचा चरमराने लगता है, और उस पर चढ़ा शख़्स, ऊँचे पेड़ पर बने घोसले की भाँति गिरने लगता है और उस  घोसले के अंडे धरती पर पड़ते ही टूट कर बिखर जाते हैं उम्मीदों की तरह विश्वास की तरह सपनों की तरह ~ सूरज सिंह बाघेल पढ़िये, पढ़ाईये, कमेंट,लाइक …

अगर लालच पैसों का है तो

मेरा शहर सुनसान करे जाओ इस दिल से अब दूर चले जाओ निशानी ए पाँव ना छोड़ो यहाँ भले सारी मेरी ज़मीन ले जाओ खुदगर्ज़ी इतनी है कि सुकून चाहिये मुझे चाहे फिर मेरी सारी शोहरतें ले जाओ मेरे उसूल बिकने वालों में से नहीं सिक्के हुस्न के कहीं और ले जाओ मरा नहीं फिर …